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आज का राशिफल

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ज्योतिष अपने आप में एक विज्ञान है और यह स्वयं ज्ञान का प्रकाशमय  स्त्रोत है; यह सूर्य के समान शाश्वत है, जातक के भविष्य की यात्रा को पार लगाने के लिए इससे उत्तम साधन कोई और नहीं है। इस ज्योतिष्मयी यात्रा में मैंने बहुत कुछ पाया है,  अतः मैं सदैव इसका ऋणी रहूंगा।

स्वागत

            ज्योतिष विषय के बारे में कहा गया है कि- “वेदस्य निर्मलं चक्षु ज्योतिशास्त्रकल्मषम” अर्थात ज्योतिष शास्त्र वेद भगवान का पवित्र नेत्र है ! यह तो वह अमूल्य धरोहर है जिसे ऋग्वेदकाल से अपनाया जा रहा है ! मेनें इस वेब साइट मे ग्रहों के संचार रहस्य को गंभीरता से समझाने का प्रयास किया है ! मेनें अपने शोधों में पाया की जीवन स्थलों पर घटने वाली एवं घटी घटनाएँ इस प्रकार व्यवस्थित की गई होती है कि जातक उनसे पदे पदे आध्यात्मिक शिक्षा ग्रहण करता है, यदि जातक वर्ग कर्म विज्ञान एवं ग्रहों कि भूमिका के मर्म को हदयंगम कर ले, तो वह अपने जीवन का उदात्तीकरण कर सकने में समर्थ होंगे, साथ ही मनुष्यगण वर्तमान कष्टों को अपना पुराना ऋण मानकर मानसिक रूप से उनसे असंपृक्त रहने का अभ्यास करते हुए क्रियमाण कर्मों का निवृत्तिपरक लक्ष्य निर्धारित कर ले, तो अवश्य ही उनके दु:खों एवं अभावों का रूपान्तरण सुख में संभव हो सकेगा !

            जातक को कर्मवाद व भाग्यवाद में भी अंतर स्पष्ट कर लेना चाहिए, कर्म विशेष का कारण नियामक संदर्भित ग्रह नहीं वरन स्वयं हमारा ही कोई किया हुआ पूर्व कर्म होता है इसलिए वेदों में कहा गया है- “कः कस्य हेतु:दुखस्य कश्यहेतु सुखस्य वा, स्वपूर्वाजितकर्मेव कारणं सुखदु:खयों !!” अतः ग्रहविज्ञान (ज्योतिष) ही प्रत्यक्ष शास्त्र है, जिसका साक्ष्य सूर्य और चंद्रमा घूम-घूम कर दे रहें, संसार में जितने भी विषय है वे केवल विवाद (शास्त्रार्थ) के विषय हैं अर्थात अप्रत्यक्ष हैं ! अप्रत्याक्षाणि शास्त्राणि, विवादस्तेषु केवलम प्रत्यक्षं ज्योतिषमं शास्त्रम, चंद्राकों यत्र साक्षिणो !! इस प्रत्यक्ष (ज्योतिष) शास्त्र के बिना श्रोत-स्मार्त कोई भी कर्म सिद्धि को प्राप्त नहीं होतें हैं, इससे उपयोग से ही व्यक्ति विशेष का जीवन कृतार्थ हो सकता है !

            यहाँ हमारी वेब-साइट मे सारे उपायों की चर्चा गई है जेसे बीसायन्त्र, वेदिक अनुष्ठान, ग्रहों से जुड़े क्षेत्र ग्रहों से जुड़ी बीमारियाँ, उनसे जुड़े शीघ्र व सुलभ उपाय, दान, यंत्र, रत्न इत्यादि ! चूँकि शास्त्रों मे कहा गया है कि –“ गोचरे वा विलग्ने वा ये ग्रहारिष्टसूचका: पूजयेत्तान प्रयत्नेन पूजिता स्यु:शुभप्रदा:!! अर्थात मनुष्य कि जन्मप्रत्रिका, हस्तरेखा, गोचर कुंडली मे जो अनिष्ट सूचक ग्रह होते हैं उनकी यत्नपूर्वक पूजा करने से, रत्न पहनने से, बीसायंत्रों को धारण करने से, नियमित अनुष्ठान करवाने से सभी ग्रह शुभप्रद हो जातें हैं ! यदि मनुष्य इन सभी युक्तियों व उपायों से जीवनयापन करता है तो वह आधिभौतिक (लग्जिरी), आधिदैविक (पेरानोरमल) एवं आध्यात्मिक (स्पीरीचूवल) ऋणों के निवारण के लिए समर्थ हो जाता है ओर इन तीनों विषय वस्तुओं का उपभोग कर पाता है अतः यह वेब साइट प्रस्तुत करने का मेरा उद्देश्य भी व अभीष्ट भी यही है !
डॉ जितेन्द्र व्यास
(लेखक / कोलमनिस्ट / ज्योतिर्विद)

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